कानून के बाद सड़को पर आई कलम
_विशेष टिप्पणी_
– *प्रतीक खरे*
छतरपुर की फिजा में इन दिनों दो तस्वीरें चर्चा में हैं। एक तस्वीर दो-तीन महीने पुरानी है जिसमे कचहरी के बाहर काला कोट पहने वकीलों का हुजूम, हाथ में मोची को थमाया ज्ञापन और सड़क पर जाम था और वजह? कलेक्टर पार्थ जायसवाल का ज्ञापन लेने बाहर न आना था | दूसरी तस्वीर आज की है—कैमरा और कलम थामे पत्रकारों का काफिला, एसपी कार्यालय के बाहर “एसपी हटाओ, जिला बचाओ” का शोर। वजह वही—एसपी आगम जैन का पहले बाहर न आना, फिर चक्का जाम के बाद ज्ञापन लेना।
दो-तीन महीने के भीतर जिले के दोनों शीर्ष अफसरों के खिलाफ उग्र आंदोलन। एक ने मोची को ज्ञापन देकर व्यवस्था क़ो आइना दिखा दिया, दूसरे ने सड़क जाम कर बता दिया कि खबर लिखने वाले अब खबर बनने को मजबूर हैं।
सवाल कुर्सी पर बैठे चेहरों से नहीं, कुर्सी के अहंकार से है। ज्ञापन कोई कागज का टुकड़ा नहीं होता साहब, वो लोकतंत्र की वो चिट्ठी है जिसे पढ़ना अफसर की मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी है। जब अफसर चैंबर की दीवारों को जनता की आवाज से ऊंचा समझने लगे, तो सड़कें ही संवाद का मंच बन जाती हैं।
वकीलो ने जब मोची को ज्ञापन सौंपा तो वो सिर्फ व्यंग्य नहीं था, वो चेतावनी थी—कि अगर व्यवस्था सुनेगी नहीं तो विकल्प खुद तलाश लेगी। पत्रकारो ने जब “मुर्दाबाद” का नारा लगाया तो वो गाली नहीं थी, वो जनमानस का वो दर्द था जो स्याही से नहीं, सड़क पर उतरकर बयां होता है।
दोनों घटनाओं में एक बात कॉमन है—संवादहीनता। और संवादहीनता की कोख से ही अविश्वास जन्म लेता है। जब डीएम की चौखट से वकील लौटे और एसपी की दहलीज से पत्रकार, तो समझ लीजिए कि फाइलों में ‘शांति’ लिखी है, पर जमीन पर ‘आक्रोश’ उबल रहा है | कानून के रखवाले और लोकतंत्र के प्रहरी—दोनों जब सड़क पर हों तो ये शहर के लिए अलार्म है। कलेक्टर और एसपी जिले के पिता-तुल्य होते हैं। पिता अगर बच्चों की फरियाद सुनने दरवाजा न खोले, तो बच्चे दीवार फांदना सीख जाते हैं।
छतरपुर को जवाब चाहिए। क्या चैंबर के एसी की हवा इतनी ठंडी हो गई कि जनता की तपिश महसूस ही नहीं होती? क्या प्रोटोकॉल का कांच इतना मोटा हो गया कि बाहर के नारे अंदर तक पहुंचते ही नहीं?
मोची को ज्ञापन और सड़क पर जाम—ये महज विरोध नहीं, लोकतंत्र की वो डायग्नोसिस रिपोर्ट है जो बता रही है कि सिस्टम के बीपी का पारा हाई है। इलाज वक्त पर न हुआ तो ये बुखार पूरे जिले को अपनी चपेट में ले लेगा
*पूछल्ला*
अफसर बदलते रहेंगे, कुर्सियां वही रहेंगी। पर कुर्सी पर बैठने वाला अगर जनता को ‘भीड़’ और ज्ञापन को ‘कचरा’ समझेगा, तो भीड़ तय करेगी कि कुर्सी सलामत रहे या नहीं।
कलम और काला कोट जब एक साथ सड़क पर हों, तो समझिए कि स्याही सूख गई है और दलीलें हार गई हैं। अब सिर्फ एक ही सवाल बाकी है—सुनोगे, या फिर अगला ज्ञापन किसे दोगे?
