गौरिहार राजनगर की स्वावलंबी गौशालायें खटाई में तीन बार काॅल हुये टेंडर नहीं मिला कोई भी ठेकेदार
प्रतीक खरे –
छतरपुर। जिले की सड़कों पर विचरण कर रहे गौवंश के लिये बनने वाली दोनो स्वावलंबी गौशालायें फिलहाल खटाई में पड़ गई हैं। कलेक्टर पार्थ जयसवाल, वन एवं पयर्यावरण राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार व राजनगर विधायक अरविन्द्र पटैरिया के विशेष प्रयासों से राजनगर विकासखण्ड के ग्राम बेनीगंज में एवं गौरिहार विकासखण्ड के ग्राम गोयरा में स्वावलंबी गौशालाओं का निर्माण किया जाना था लेकिन अब यह योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही है। क्योंकि तीन बार टेंडर काॅल किये जाने के बाद भी किसी भी ठेकेदार ने अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिस कारण समूची योजना ठंडे बस्ते में दफन हो गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छतरपुर कलेक्टर पार्थ जयसवाल की पहल पर सरकार ने सड़कों पर विचरण करने वाले आवारा गौवंश को गौशाला में सिफ्ट करने के लिये स्वावलंबी गौशाला बनाने का निर्णय लिया था। इस योजना के तहत् राजनगर विकासखण्ड के ग्राम बेनीगंज में 125 एकड़ और गौरिहार विकासखण्ड के ग्राम गोयरा में 125 एकड़ भूमि भी गौअभ्यारण के लिये आरक्षित कर दी थी। इन दोनों गौशालाओं में 5-5 हजार आवारा गौवंश को रखा जाना था। यदि यह योजना फलीभूति हो जाती तो छतरपुर जिले से आवारा गौवंश की समस्या समाप्त हो जाती । सूत्र बताते है कि इस योजना के लिये वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार व राजनगर विधायक अरविन्द्र पटेरिया ने भी काफी प्रयास किये थे। पर राज्य शासन द्वारा गौशाला संचालन के लिये ठेकेदारों के सामने जो शर्ते रखी उन शर्तों पर कोई भी ठेकेदार काम करने के लिये तैयार नहीं हुआ। पशु चिकित्सा विभाग छतरपुर के उपसंचालक डां अशोक जैसवानी ने बताया कि जिले में बनने वाली इन दोनो गौशालाओं को पूरी तरह से स्वावलंबी बनाया जाना था। जिसके लिये गौशाला के अंदर ही बिजली उत्पन्न करने के लिये सोलर प्लांट, गैस के लिये गोबर गैस प्लांट, खाद बनाने के प्लांट के साथ ही गौकास्ट तैयार करने के लिये मशीनरी लगाई जाना थी। इसके अलावा गौमूत्र से बनने वाले गोनापल प्लांट भी लगाया जाना था। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार के स्तर पर तीन बार टेंडर लगाये गये पर किसी भी ठेकेदार ने भागीदारी नहीं निभाई। तीसरी बार के टेंडर में केवल एक ठेकेदार ने रूची ली पर उसे काम आवंटित नहीं किया जा सका।
सूत्र बताते है कि जिले से जब योजना बनकर भोपाल पहुंची तो भोपाल स्तर के अधिकारियों ने कुछ ऐसी शर्तें जोड़ दी जो ठेकेदारों को रास नहीं आईं। अब्बल तो राज्य सरकार ने गौअभ्यारण का नाम बदलकर स्वावलंबी गौशाला कर दिया और फिर 40 लाख ईएमडी की राशि के साथ ही ठेकेदार के लिये तीन वर्ष का अनुभव और 50 करोड़ का समान कार्य का टर्नओवर निर्धारित कर दिया। जिस कारण ठेकेदारों ने पूरे प्रोजेक्ट से दूरी बना ली और छतरपुर जिला प्रशासन के साथ ही जनप्रतिनिधियों के अरमानों पर पानी उड़ल गया।
