छतरपुर-नौगांव में कचरे का साम्राज्य
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_कर्मचारी नेताओं के खेतों में बजा रहे ‘ड्यूटी’_
-प्रतीक खरे
*छतरपुर।* जिले के नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार और मनमानी का आलम यह है कि ‘सेवा’ शब्द ही बेमानी हो गया है। हालात देखकर लगता है कि नगर पालिका जनता की नहीं, रसूखदारों की ‘निजी कंपनी’ बन गई है।
छतरपुर और नौगांव नगर पालिका में सबसे बुरा हाल है। सूत्रों के मुताबिक यहां के अधिकांश कर्मचारी सरकारी खजाने से हर महीने वेतन तो उठा रहे हैं, पर ड्यूटी नगर के वार्डों में नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के बंगलों और खेतों में बजा रहे हैं। कोई साहब की गाड़ी धो रहा है, कोई खेत में पानी लगा रहा है, कोई घर का राशन ढो रहा है। शहर की सफाई, नाली, लाइट जैसी मूलभूत सेवाएं भगवान भरोसे हैं।
*अध्यक्ष बेबस, सीएमओ निरंकुश*
स्थिति यह है कि नगर पालिका अध्यक्षों का मुख्य नगर पालिका अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं बचा। सीएमओ अपनी मनमर्जी के मालिक हैं। अध्यक्ष अगर सफाई को लेकर सवाल उठाते हैं तो फाइलें दबा दी जाती हैं। नतीजा—पूरे शहर में जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं। नालियां चोक हैं, मच्छरों का प्रकोप है, पर सुनने वाला कोई नहीं।
*कर्मचारी नदारद, शहर बदहाल*
वार्डों में पदस्थ सफाई कर्मचारियों की ड्यूटी रजिस्टर में हाजिरी तो रोज लगती है, पर मौके पर वे मिलते नहीं। रहवासियों का आरोप है कि कई कर्मचारी तो महीने में एक बार भी वार्ड में झाड़ू लगाने नहीं आते। उनकी ‘ड्यूटी’ किसी नेता के फार्म हाउस पर लगी है। कचरा गाड़ी हफ्तों नहीं आती। बरसात से पहले नालों की सफाई का अभियान सिर्फ कागजों में चल रहा है।
*प्रशासन मौन, जनता बेहाल*
सबसे हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन भी इस पूरे खेल पर चुप्पी साधे हुए है। शिकायतों के पुलिंदे कलेक्टर कार्यालय पहुंचते हैं, पर कार्रवाई के नाम पर शून्य। न किसी कर्मचारी पर निलंबन की गाज गिरी, न किसी सीएमओ से जवाब-तलब हुआ।
जनता टैक्स दे रही है, पर बदले में बीमारी और बदबू मिल रही है। अगर ‘तनख्वाह सरकारी, ड्यूटी दरबारी’ का यह सिस्टम नहीं टूटा तो स्वच्छ भारत अभियान नगरीय निकायों की फाइलों में ही दम तोड़ देगा। सवाल सीधा है—क्या कलेक्टर इस ‘कचरा राज’ पर झाड़ू चलाएंगे, या चुप्पी ही प्रशासन की नीति बन गई है?
