पौराणिक जीवंत चित्रण दर्शाता देवताओं का अनोखा दरबार प्राचीन हनुमान चालीसा मंदिर के बारे में कलेक्टर श्रोत्रिय ने दी अदभुत जानकारी
टीकमगढ़। नगर में किले के सामने स्थित हनुमान चालीसा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय पौराणिक परंपरा, देवताओं के आपसी धार्मिक संबंध और धार्मिक दर्शन का जीवंत प्रतीक है। इस मंदिर की विशेषता इसकी चार मंज़िलें हैं, जिनकी संरचना किसी वास्तु संयोग से नहीं, बल्कि गहरे पौराणिक आधार और तार्किक धार्मिक क्रम के अनुसार की गई है। इस अनोखी व्यवस्था की जानकारी कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय द्वारा पौराणिक संदर्भों के साथ विस्तार से प्रस्तुत की गई, जिसके बाद यह मंदिर चर्चा का विषय बन गया है। साथ ही रियासत के राजघराने से ताल्लुक रखने बाले राव राजा विश्ववजीत सिँह जूदेव ने मंदिर के बारे में ऐतिहासिक जानकारी, प्राचीन चित्रण देकर इसे और ज्यादा रोचक बना दिया।
*भागीरथ गंगा से लेकर महाभारत तक का जीवंत चित्रण है हनुमान चालीसा मंदिर*
पौराणिक मान्यताओं के आधार पर कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय द्वारा बताए गए पौराणिक विवरण के अनुसार पांच मंजिला हनुमान चालीसा मंदिर के प्रथम तल पर भगवान शिव की स्थापना की गई है। पौराणिक कथा के अनुसार जब राजा भगीरथ गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, तब गंगा के वेग को संभालने के लिये भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया। यही कारण है कि मंदिर की संरचना में सबसे नीचे भगवान शिव को स्थान दिया गया है, क्योंकि गंगा सबसे पहले उनकी जटाओं में आईं।
द्वितीय तल पर माँ गंगा का मंदिर स्थापित है। श्रीमद् भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार गंगा का उद्गम भगवान विष्णु के चरणों से माना गया है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में तीन पगों में ब्रह्मांड नापा, तब उनके चरणों से निकला जल गंगा के रूप में प्रकट हुआ, जिसे विष्णुपदी कहा गया। इसीलिए मंदिर में गंगा जी को भगवान शिव के ऊपर और भगवान विष्णु के नीचे स्थान दिया गया है। तृतीय तल पर भगवान विष्णु सत्यनारायण स्वरूप में विराजमान हैं। मंदिर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर भगवान हनुमान विराजमान हैं। महाभारत के युद्ध का प्रसंग बताते हुए कलेक्टर श्रोत्रिय ने बताया कि जब भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी बने, तब अर्जुन के रथ के ध्वज पर भगवान हनुमान विराजमान थे। भगवान कृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार हैं, इस प्रकार हनुमान जी का स्थान विष्णु जी के रथ ध्वज पर सबसे ऊपर था। इसी पौराणिक प्रसंग के आधार पर मंदिर में हनुमान जी को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है। इस प्रकार मंदिर की चारों मंज़िलें केवल निर्माण नहीं, बल्कि एक पौराणिक क्रम हैं।
सबसे नीचे शिव, फिर गंगा, फिर विष्णु और सबसे ऊपर हनुमान।
यह क्रम देवताओं के आपसी संबंध, अवतारों की परंपरा और पौराणिक घटनाओं पर आधारित एक अद्भुत धार्मिक संरचना प्रस्तुत करता हैपौ
राणिक, धार्मिक व संस्कृति की अद्भुत स्थापत्य व्याख्या का भी अनोखा उदाहरण
कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने टीकमगढ़ कलेक्टर बनने के पूर्व मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड में अपर प्रबंध निदेशक के पद पर कार्य करते हुये महत्वपूर्ण भूमिकाये निभाई है। जिसका उल्लेखनीय अनुभव लाभ अब टीकमगढ़ जिले में मौजूद ऐतिहासिक स्थलों को रोचक अंदाज में प्रदर्शित किये जाने के रूप में जिले को मिल रहा है। इसी पर्यटन रूपी लाभ जिले को देने के उद्देश्य से पर्यटन की पारखी नजर से देखकर कलेक्टर श्रोत्रिय ने बताया कि यह हनुमान चालीसा मंदिर केवल आस्था के केंद्र के रूप में ही नहीं बनाया गया था, बल्कि इस मंदिर को बनाते समय इसमें पौराणिक संबंधों का जीवंत क्रम उकेरा गया है, जहाँ प्रत्येक मंज़िल बेदो में उल्लेखित एक पौराणिक कथा का स्वयं जीवंत वर्णन करती हुई दिखाई देती है। इस कारण से यह मंदिर पौराणिक ज्ञान, धार्मिक दर्शन और भारतीय संस्कृति की अद्भुत स्थापत्य व्याख्या का देश का एकमात्र अनोखा उदाहरण बन गया है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तक जाते हुए पूरी पौराणिक कथा को भी अनुभव करते हैं।
*महाराजा के निर्देश पर शिल्पकार लाला परतीत राय ने बनाया था मंदिर*
राजघराने से ताल्लुक रखने बाले राव राजा विश्वजीत सिँह जूदेव ने हनुमान चालीसा मंदिर की ऐतिहासिक जानकारी देते हुये बताया कि हनुमान चालीसा मंदिर एक प्राचीन और अनूठा मंदिर है, जिसे अपनी विशिष्ट बनावट के कारण टावर नुमा मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण तीन महाराजाओं के कार्यकाल से संबंधित रहा है। जिसमें ओरछा रियासत के महाराज विक्रमादित्य सिँह के द्वारा इस मंदिर की रुपरेखा रखी गई। इसके बाद महाराजा प्रताप सिँह जूदेव और महाराजा वीरसिंह जूदेव के द्वारा राजदरवार के शिल्पकार आर्किंटेक्टर लाला परतीत राय को मंदिर बनबाने का निर्देश देकर निर्माण कराया गया।
*शिल्पकार के नाम पर रहा मंदिर का नाम प्रशिद्ध, किले से दर्शन करने उत्तरमुखी प्रतिमा*
राव राजा विश्वजीत सिँह जूदेव ने बताया कि शिल्पकार लाला परतीत राय द्वारा 17 से 18वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण पूर्ण किया था। तब से प्राचीन समय में शिल्पकार परतीत राय के नाम से मंदिर को परतीतला मंदिर कहा जाता था। साथ ही कुछ लोग इस नाम की व्याख्या को तालाब से भी जोड़ते है। महेंद्र सागर तालाब के ऊपर मंदिर बना हुआ होने की बजह से भी परतीतला नाम चलन में आया। जिसका अर्थ है तला के पर अर्थात ऊपर स्थित मंदिर। हनुमान चालीसा मंदिर नामकरण की बजह बताते हुये कहा कि हनुमान चालीसा पाठ की 40 चौपाइयों के प्रतीक स्वरूप मंदिर तक पहुँचने के लिए 40 सीढ़ियाँ बनवाई थीं, जिसके कारण इसे हनुमान चालीसा मंदिर कहा जाता है।
मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा उत्तरमुखी इसलिये है क्योंकि मंदिर के उत्तर दिशा में किला है। जिससे महाराजा द्वारा किले से ही हनुमान जी के दर्शन किये जाते थे।
*कलम दवात स्वरूप आज भी है राजा विश्वजीत सिँह के पास*
राव राजा विश्वजीत सिँह ने छुपी हुई जानकारी देते हुये बताया कि हनुमान चालीसा मंदिर का प्राचीन वास्तविक स्वरूप एक पीतल की छवि के रूप में आज भी मौजूद है। जिसकी फोटो भी राव राजा द्वारा हरिभूमि को उपलब्ध कराई गई। उन्होंने बताया कि राजशाही जमाने के शिल्पकार (आरकिटेक्ट ) परतीत राय द्वारा कलम दवात के रूप में मंदिर बनाया गया। जो कायस्थ समाज से आते है जिनके बंशज आज भी है। इनके नाम के साथ लगने बाला राय शब्द इन्हे उपाधि रूप में मिला है।
*मंदिर के नाम से है 63 एकड़ क़ृषिभूमि*
राजघराने और प्रशासनिक अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार हनुमान चालीसा मंदिर के लिये महाराजा द्वारा 63 एकड़ क़ृषि जमीन भी आबंटित की गई थी। जिसमें से 40 एकड़ का एक रकवा और 23 एकड़ का दूसरा रकवा है। यह क़ृषि जमीन वार्ड क्रमांक 26 में स्थित है। वार्ड क्रमांक 26 के निवासियों ने बताया कि हनुमान चालीसा मंदिर की 63 एकड़ क़ृषि जमीन वार्ड में ही अनगड़ा वाईपास पर स्थित है। जो शासकीय दस्तावेजो के अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे मंदिर के पुजारी परिवार की देखरेख में है
