क्या सच में सब पर भारी हैं कटरवाज वर्दीवाले
विशेष टिप्पणी – _प्रतीक खरे_
छतरपुर जिले की कानून व्यवस्था पटरी पर लौटने का नाम नहीं ले रही है। कप्तान पूरी सिद्दत के साथ कप्तानी पारी खेलना चाहते हैं, पर उनके फील्डर कैच छोड़ने के आदि हो चुके हैं, जिस कारण कप्तान का प्रत्येक शॉट बाउंड्री तक पहुंचने से पहले ही निस्तेज हो जाता है। रही सही कसर प्रत्येक थाने में वर्षों से अंगद की तरह पैर जमाए बैठे कटरवाज पूरी कर देते हैं।
राजनगर की घटना ने जनता के बीच पुलिस की विश्वसनीयता की नींव को हिला कर रख दिया है। ईमानदार और निष्पक्ष कप्तान के लिए भी राजनगर थाना कांड चिंतनीय है। इस कांड के बाद उन्हें अपने तेवरों में तल्खी लाने की जरूरत महसूस हो रही होगी। अगर एक बार पूरी फील्डिंग की जमावट नए सिरे से जमाते हैं, तो जिले के साथ-साथ पुलिस महकमे के लिए भी बेहतर होगा।
बताते चलें कि पुलिस की लंका लगाने में कटरवाज महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पुलिसिया भाषा में जो प्रभारी के लिए बसूली का काम करते हैं, उन्हें सांकेतिक भाषा में कटरवाज कहा जाता है। इन कटरवाजों को अपने प्रेजेंट बॉस की ओर से पूरी छूट होती है, जिस कारण इनके हौसले बुलंद रहते हैं। मजेदार यह है कि इन्हें राजनैतिक संरक्षण भी हासिल होता है, जिस कारण जिला लेविल के अधिकारी इन्हें चाह कर भी हिला-डुला नहीं पाते। और यही संरक्षण कटरवाज कर्मचारियों के लिए कुंडल कवच का काम करता है।
राजनगर कांड के बाद प्रशासन का ज्यूडिशियल जांच का निर्णय तुरप का इक्का साबित हुआ, इस निर्णय ने जन आक्रोश थामने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों संदिग्ध आरक्षकों के तत्काल निलंबन ने भी आक्रोश की आग को काफी हद तक ठंडा किया। यदि थाना प्रभारी पर भी निलंबन की तुरित कार्यवाही होती, तो उत्तम होता।
