आख़िर फ़ाइलों पर कुंडली मारने वाले दंडित क्यों नहीं?
आख़िर फ़ाइलों पर कुंडली मारने वाले दंडित क्यों नहीं?
विशेष टिप्पणी
— प्रतीक खरे
छतरपुर
जब भी कोई विधायिका कर्तव्य-शून्य होकर स्वार्थ की चाशनी में लिपट जाती है, तब वहाँ की कार्यपालिका स्वच्छंद होकर कल्पनालोक में विचरण करने लगती है और फ़ोकट की वाहवाही लूटने की आदी होकर स्वयं अपनी पीठ थपथपाने में जुट जाती है। गलती उजागर होने के बाद दोषियों को दंडित न कर स्वयं वाहवाही लूटना, “अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनना” वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
मंगलवार की जनसुनवाई में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने प्रशासनिक गफलत को न सिर्फ उजागर कर दिया, बल्कि अधिकारियों की गलतियों की धज्जियाँ उड़ा दीं। यहाँ एक बेटी ने अपने पिता के साथ वर्षों से हो रहे आर्थिक अत्याचार की मार्मिक कहानी सुनाकर धांधली की पूरी दास्तान सामने रख दी। एक परिवार अधिकारियों की मनमानी का शिकार होकर कैसे आर्थिक अभाव में अपने परिवार का गुजर-बसर करता रहा होगा, जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।
कलेक्टर साहब, आपने बेटी योगिता की गुहार पर उसके पिता सुनील निगम को कुछ ही घंटों में समयमान वेतन स्वीकृत कर न्याय तो दिया, पर साहब, यह न्याय अभी अधूरा है। जी हाँ, साहब, यह न्याय अभी अधूरा है!
यदि आप ग्राम पंचायत सिलावट के सचिव सुनील कुमार निगम और उसकी बेटी योगिता को वास्तविक न्याय देना चाहते हैं, तो उसकी समयमान वेतनमान की फ़ाइल पर जो-जो कुंडली मारकर बैठे थे, उन्हें निलंबित करें और जाँच करवाएँ कि वे ऐसी और कितनी फ़ाइलों पर कोबरा बनकर बैठे हैं।
